TIL Desk नई दिल्ली:👉प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए संयमित और सकारात्मक वाणी के महत्व पर संदेश दिया। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय के 15वें श्लोक को साझा किया, जिसमें वाणी की तपस्या यानी ‘वाङ्मय तप’ का उल्लेख है।

श्लोक है— “अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥”

इसका भावार्थ है कि व्यक्ति को हमेशा ऐसी बात कहनी चाहिए जो सत्य, मधुर और कल्याणकारी हो तथा जिससे किसी दूसरे व्यक्ति के मन में दुख, भय या अशांति पैदा न हो। साथ ही वेदों और शास्त्रों का नियमित अध्ययन एवं चिंतन भी वाणी की तपस्या का हिस्सा है।

इस संदेश के माध्यम से यह बताया गया है कि तप केवल शारीरिक कष्ट सहने तक सीमित नहीं है। हमारी वाणी में किसी को आहत करने के साथ-साथ उसे प्रोत्साहित और प्रेरित करने की भी शक्ति होती है। इसलिए प्रेम, सत्य, संयम और हित की भावना से बोलना तथा ज्ञान से निरंतर जुड़े रहना ही वाणी की वास्तविक साधना है।