लखनऊ डेस्क/ लखनऊ में ब्याही शाजदा खातून ने अपने पति जुबेर अली से खुला (तलाक) लेने की बहुत कोशिश की लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। इस्लाम में पति को तलाक देने और महिला को खुला लेने का अधिकार दिया गया है। खुला लेने के बाद औरत अपनी मर्जी से रह सकती है। यह कदम उठाने में शाजदा की मदद करने वाली ‘मुस्लिम वूमन लीग’ की महासचिव नाइश हसन ने बताया कि शाजदा पति के जुल्म से बहुत परेशान थी।
शनिवार को शाजदा खातून ने प्रेस कांफ्रेंस में खुला के नोटिस पर सार्वजनिक रूप से दस्तखत कर भेज दिया। शाजदा का कहना है कि वह पति से खुला लेने के लिए दो बार इस्लामी शिक्षण संस्थान नदवा और एक बार फिरंगी महल भी गई, लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। कुरान और हदीस में इसे लेकर कोई रोक भी नहीं है।वह पिछले 18 महीने से उससे अलग रहकर बच्चों को पढ़ाकर अपना गुजारा कर रही थी। तमाम अपील के बावजूद उसका पति ना तो उसे तलाक दे रहा था और ना ही खुला। शाजदा की ‘इद्दत’ की अवधि नवम्बर में खत्म होगी। उसके बाद उसका खुला मुकम्मल हो जाएगा।
‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि खातून ने खुला लेने का जो तरीका अपनाया है, वह सही नहीं है। सिर्फ एक खत के आधार पर खुला नहीं मिलता। खुला की इच्छुक महिला को अपने पति को नोटिस देना होता है। अगर पति तीन नोटिस दिए जाने के बावजूद जवाब नहीं देता है तो खुला अपने आप लागू हो जाएगा। मौलाना की इस दलील पर नाइश ने कहा कि अगर उन्हें शाजदा का कदम गलत लगता है तो अपने दावे को कोर्ट में साबित करें।
ऑल इण्डिया मुस्लिम वूमेन पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अम्बर ने खा़तून के कदम को सही करार देते हुए कहा कि जब शौहर और इस्लामी ओहदेदार लोग ख़ुला के लिये मदद नहीं करते तो महिला ‘निकाह फस्ख़’ का रास्ता अपना सकती है। ऐसी स्थिति में उसे ना तो काजी की और ना ही तलाक की जरूरत होती है।