चंडीगढ़.
किसान अक्सर मिट्टी की जांच तो कराते हैं, लेकिन सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले ट्यूबवेल के पानी की जांच को नजरअंदाज कर देते हैं। कई बार अच्छी जमीन और बेहतर बीज होने के बावजूद फसल की पैदावार कम होने का कारण पानी की खराब गुणवत्ता होती है। इसी को देखते हुए हरियाणा सरकार ने किसानों को ट्यूबवेल के पानी की नियमित जांच कराने के लिए प्रेरित किया है, ताकि पानी की गुणवत्ता के हिसाब से फसलों का चयन किया जा सके।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्याम सिंह राणा ने 'करवाओगे पानी की जांच, नहीं आएगी फसल उत्पादन पर आंच' नाम से एक नारा दिया है। उनका कहना है कि सिंचाई के पानी में यदि लवणता (नमक की मात्रा) या क्षारीयता अधिक हो तो इसका सीधा असर मिट्टी की उर्वरता और फसल उत्पादन पर पड़ता है। समय पर जांच रिपोर्ट मिलने से किसान यह तय कर सकते हैं कि उनके खेत के लिए कौन-सी फसल अधिक उपयुक्त रहेगी और खाद एवं उर्वरकों का कितना और किस प्रकार उपयोग करना चाहिए। इससे उत्पादन लागत घटाने और बेहतर पैदावार हासिल होने में मदद मिल सकती है।
पानी की जांच कराना भी बेहद आसान है। इसके लिए किसान सबसे पहले अपने ट्यूबवेल को कम से कम 30 मिनट तक लगातार चलाएं। इसके बाद लगभग 500 मिलीलीटर या एक लीटर पानी एक साफ प्लास्टिक की बोतल में भरें। बोतल पर अपना नाम, मेरी फसल-मेरा ब्योरा (एमएफएमबी) आइडी, गांव का नाम, किल्ला/खसरा नंबर, मोबाइल नंबर तथा बोरवेल की गहराई (फीट में) स्पष्ट रूप से लिखें।
इसके बाद इस नमूने को नजदीकी मृदा स्वास्थ्य जांच प्रयोगशाला (साइल टेस्टिंग लैब) में जमा कराया जा सकता है। प्रयोगशाला की रिपोर्ट के आधार पर किसानों को सिंचाई जल की गुणवत्ता, उपयुक्त फसल चयन और खाद प्रबंधन के संबंध में वैज्ञानिक सलाह मिलेगी, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता लंबे समय तक सुरक्षित रखने में भी मदद मिलेगी।
कृषि मंत्री ने किसानों से कहा है कि वे बिना जांच के अनुमान के आधार पर खेती करने की बजाय वैज्ञानिक सलाह को अपनाएं। पानी की जांच और संबंधित योजनाओं की अधिक जानकारी के लिए किसान टोल-फ्री नंबर 1800-180-2117 पर संपर्क कर सकते हैं या अपने जिले के कृषि उप-निदेशक कार्यालय से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे न केवल फसल उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी, बल्कि मिट्टी और पानी दोनों का बेहतर एवं टिकाऊ प्रबंधन भी संभव हो सकेगा।
