State, Uttar Pradesh

सावन आते ही मणिपर्वत से शुरू होती अयोध्या की सदियों पुरानी झूलन परंपरा

अयोध्या
सावन की पहली फुहार अयोध्या की धरती पर पड़ते ही यहां का पूरा वातावरण बदल जाता है। यह बदलाव सिर्फ मौसम का नहीं होता। यह उस पूरे नगर की सांस्कृतिक धड़कन में उतरता है, जिसने सदियों से अपनी आस्था को त्योहारों की लय में पिरोया है। मंदिरों के कपाट खुलते ही भजन कीर्तन की स्वर लहरियां गूंजने लगती हैं, सरयू के घाटों पर श्रद्धालुओं का तांता लगने लगता है, दुकानों पर झूले और सजावट का सामान सजने लगता है, और पूरे नगर की निगाहें एक तयशुदा दिशा में मुड़ जाती हैं यानी मणिपर्वत की ओर। यह वह स्थान है जहां से हर साल झूलनोत्सव की पहली विधिवत शुरुआत होती है। सावन शुक्ल तृतीया की सुबह भगवान श्रीसीताराम के झूलन विहार के साथ यह विश्वप्रसिद्ध उत्सव अपना पहला कदम रखता है, और इसी क्षण से अयोध्या की गलियां, घाट और मंदिर एक नई लय में जीने लगते हैं। उस दिन मणिपर्वत सिर्फ एक प्राचीन टीला भर नहीं रहता। यह पूरे शहर की श्रद्धा का केंद्र बिंदु बन जाता है, एक ऐसा स्थल जहां अलग अलग मंदिरों की परंपराएं आकर एक दूसरे से गले मिलती हैं।

जब पूरा नगर एक साथ चलता है
कनक भवन, दशरथ राजमहल, मणिराम छावनी और रामवल्लभा कुंज जैसे प्रमुख मंदिरों से भगवान की मूर्तियाँ पालकियों और शोभायात्राओं में सजकर निकलती हैं। रास्ते भर श्रद्धालु फूल बरसाते हैं, शंखनाद गूंजता है, वेदमंत्रों का उच्चारण होता है, और ढोल मंजीरों के साथ भजन कीर्तन की टोलियां साथ साथ चलती हैं। जब यह यात्राएं मणिपर्वत पहुंचती हैं, तो वहां भगवान को विधिवत झूला झुलाया जाता है। यहीं से अयोध्या के झूलनोत्सव की आधिकारिक गिनती शुरू मानी जाती है। इस अनुष्ठान के बाद विग्रह अपने अपने मंदिरों को वापस लौटते हैं और वहां रक्षाबंधन तक झूलों पर विराजमान रहते हैं, जहां रोज दर्शन और आरती का सिलसिला चलता रहता है। दिलचस्प बात यह है कि श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में यह उत्सव परंपरागत रूप से नागपंचमी से शुरू होता है, यानी वहां की अपनी अलग तिथि परंपरा है। फिर भी सावन की इस पूरी सांस्कृतिक धारा का उद्गम स्थल मणिपर्वत ही माना जाता है, जो इसे बाकी सब मंदिरों से एक कदम आगे और एक पीढ़ी पुराना दर्जा देता है।

मणिपर्वत का नाम, दो कहानियों में
मणिपर्वत के नाम और महत्व के पीछे दो अलग अलग पर एक दूसरे को पूरक बनाती कहानियां प्रचलित हैं। मधुर उपासना परंपरा के संत इसे भगवान राम और माता सीता का विहार स्थल मानते हैं। उनका विश्वास है कि सावन की इसी ऋतु में युगल सरकार यहां प्रकृति के बीच विचरण करती थी, बादलों की छांव और हरियाली के बीच पल बिताती थी। आज की झूलन परंपरा दरअसल उसी दिव्य स्मृति का सांस्कृतिक विस्तार है, जिसे भक्तगण पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत रखते आए हैं। इससे अलग एक दूसरी लोककथा भी उतनी ही दिलचस्प है।

एक जड़,कई शाखाएं
मणिपर्वत से निकली यह झूलन परंपरा किसी एक जगह तक सीमित नहीं रहती। यह पूरे अयोध्या में फैलकर कई अलग अलग रूपों, रीतियों और उत्सवों में खिल उठती है, हर मंदिर अपने ढंग से इस विरासत को आगे बढ़ाता है।

रंगमहल यानी रामकोट में लगभग 300 साल पुरानी आचार्य परंपरा आज भी जीवंत है। आषाढ़ पूर्णिमा से लेकर रक्षाबंधन तक भगवान चांदी जड़ित काष्ठ के भव्य झूले पर विराजते हैं, और हर शाम कथक नृत्य व भजन गायन का सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होता है, जो श्रद्धालुओं को भक्ति के साथ साथ कला का भी आनंद देता है। सावन कृष्ण पक्ष की एकादशी पर फूल बंगला की झांकी सजाई जाती है, जिसमें भगवान को सुगंधित फूलों से पूरी तरह ढंक दिया जाता है। वहीं शुक्ल पक्ष की एकादशी पर गलबहियां की झांकी होती है। यह दोनों झांकियां रंगमहल की सबसे विशिष्ट पहचान मानी जाती हैं, जिनके दर्शन के लिए दूर दूर से संत और श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मंदिर की परंपरा के अनुसार यह कभी भगवान श्रीराम के कुलदेवता भगवान रंगनाथ का स्थान था। मान्यता है कि माता कौशल्या ने यह महल स्वयं सीता माता को मुंह दिखाई में उपहार स्वरूप दिया था। इसी परंपरा में एक और कथा जुड़ती है, विभीषण द्वारा भगवान रंगनाथ को लंका ले जाने की, और वहां से आगे तमिलनाडु के रंगनाथपुरम में उनके स्थायी रूप से विराजमान होने की।

सद्गुरु सदन यानी गोलाघाट में झूलनोत्सव गुरु पूर्णिमा से शुरू होकर भाद्रपद कृष्ण तृतीया तक, यानी लंबे समय तक, चलता रहता है। हर रोज झूलन झांकी सजाई जाती है और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। उत्सव के अंतिम दिन ब्रह्ममुहूर्त के पवित्र समय में लक्ष्मण किलाधीश के पदगायन के साथ भगवान को भावभीनी विदाई दी जाती है। यह क्षण बेहद भावुक माना जाता है, जब श्रद्धालु अपने आराध्य से अगले सावन में फिर से पधारने की मार्मिक प्रार्थना करते हैं, मानो किसी अपने को विदा कर रहे हों।

जानकी बाग यानी चक्रतीर्थ में इस पूरी झूलन यात्रा का औपचारिक समापन एक दिवसीय आयोजन के साथ होता है, जो पूरे सावन भर चली इस उत्सव श्रृंखला पर विराम लगाता है और अगले साल फिर मिलने का वादा छोड़ जाता है।

कांवड़ की धारा, आस्था की साझेदारी
झूलनोत्सव के इसी दौर में सावन का एक और रंग भी पूरे उफान पर होता है, कांवड़ यात्रा। शिवभक्त कंधों पर कांवड़ सजाकर सरयू का पवित्र जल भरते हैं और पैदल यात्रा करते हुए नागेश्वरनाथ महादेव सहित नगर के विभिन्न शिवालयों में पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं। हर सोमवार को इन मंदिरों में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है, कतारें लंबी होती जाती हैं, और बोल बम के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठता है। यह दृश्य साफ बताता है कि अयोध्या में सावन किसी एक परंपरा या एक मंदिर तक सीमित उत्सव नहीं है। यह कई अलग अलग धार्मिक धाराओं यानी राम भक्ति और शिव भक्ति का एक साझा, जीवंत लोकपर्व है, जहां हर आस्था को अपनी जगह और अपना सम्मान मिलता है।

मणिपर्वत से उठने वाली हर शोभायात्रा हर साल सिर्फ एक धार्मिक रस्म भर नहीं होती। यह उस अटूट सांस्कृतिक कड़ी की याद दिलाती है, जिसने सदियों से अयोध्या की पहचान को जीवित और जाग्रत बनाए रखा है। झूलन विहार की शुरुआत से लेकर रंगमहल की भव्य झांकियों, सद्गुरु सदन की भावुक विदाई और कांवड़ यात्रा की उमंग तक, यह पूरा सावन रक्षाबंधन तक एक अटूट, निरंतर बहती लय में आगे बढ़ता रहता है। शायद यही वजह है कि अयोध्या सावन का इंतजार सिर्फ बारिश या ठंडी हवाओं के लिए नहीं करती। यह उस सैकड़ों साल पुरानी विरासत के दोबारा लौट आने के लिए करती है, जो हर साल नए सिरे से मणिपर्वत से अपना सफर शुरू करती है और पूरे नगर को अपने साथ इस यात्रा में शामिल कर लेती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *