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आत्मनिर्भर ऊर्जा की दिशा में यूपी सरकार के बायोगैस अभियान को सहयोग देगा सिंटेक्स

आत्मनिर्भर ऊर्जा की दिशा में यूपी सरकार के बायोगैस अभियान को सहयोग देगा सिंटेक्स
  • सरकार की बायोगैस ग्राम और आधुनिक गौशाला योजना को मिलेगा तकनीकी सहयोग
  • प्रतिदिन 100 किलो गोबर और रसोई के गीले कचरे से चलने वाला प्लांट हर महीने करीब 130-135 किलो एलपीजी की बचत कर सकता है
  • कम समय में लगने वाला प्लांट, जरूरत पड़ने पर दूसरी जगह भी किया जा सकता है स्थापित

TIL Desk लखनऊ:👉उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के सभी जिलों में मॉडल बायोगैस ग्राम और आधुनिक गौशालाएं विकसित करने की योजना बनाई है। इस पहल को गति देने के लिए जल प्रबंधन समाधानों की अग्रणी कंपनी सिंटेक्स ने अपने फ्लोटिंग टाइप बायोगैस प्लांट के जरिए सरकार के प्रयासों में सहयोग देने की घोषणा की है।

यह बायोगैस प्लांट गोबर और रसोई के गीले कचरे से खाना पकाने की गैस तैयार करता है। बायोगैस बनने के बाद बचने वाला घोल किसानों के लिए प्राकृतिक खाद के रूप में काम आता है। इससे मिट्टी की ताकत बढ़ती है और यूरिया व डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम होती है। इससे गांवों, गौशालाओं और विभिन्न संस्थानों को ऊर्जा के साथ-साथ बेहतर खेती का भी लाभ मिलता है।

हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण एलपीजी की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर किसानों की लागत पर भी पड़ा है। ऐसे समय में स्थानीय स्तर पर गैस और प्राकृतिक खाद तैयार करने वाले बायोगैस प्लांट ऊर्जा के साथ-साथ खेती के लिए भी उपयोगी साबित हो सकते हैं।

वेलस्पन बीएपीएल के प्रबंध निदेशक एवं सिंटेक्स के निदेशक यशोवर्धन अग्रवाल ने कहा, “उत्तर प्रदेश में देश की सबसे अधिक पशुधन संपदा है। सरकार की बायोगैस ग्राम और आधुनिक गौशालाओं की पहल ग्रामीण क्षेत्रों को नई दिशा दे सकती है। यदि बड़े स्तर पर बायोगैस प्लांट लगाए जाएं तो गोबर और रसोई के गीले कचरे से रसोई गैस तैयार होगी और किसानों को अच्छी गुणवत्ता की प्राकृतिक खाद भी मिलेगी। इससे गांव ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकते हैं। सिंटेक्स इस अभियान में सरकार के साथ मिलकर काम करने के लिए पूरी तरह तैयार है।”

सिंटेक्स के बायोगैस प्लांट केवल ग्रामीण परिवारों तक सीमित नहीं हैं। इन्हें गौशालाओं, स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, नगर निकायों, सरकारी कार्यालयों, धार्मिक स्थलों और अन्य बड़े परिसरों में भी लगाया जा सकता है, जहां प्रतिदिन बड़ी मात्रा में गोबर या गीला कचरा निकलता है।

अग्रवाल ने कहा कि खाना पकाने की गैस और उर्वरकों जैसी जरूरी चीजों के लिए देश को पूरी तरह वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। इसी उद्देश्य से सिंटेक्स विभिन्न सरकारी विभागों और कार्यान्वयन एजेंसियों के साथ मिलकर बड़े स्तर पर बायोगैस प्लांट लगाने की संभावनाओं पर काम कर रहा है।

उन्होंने बताया कि भारत में पशुधन की संख्या लगभग 5 प्रतिशत बढ़कर 53.6 करोड़ से अधिक हो गई है, जिसमें उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। ऐसे में राज्य में बायोगैस प्लांट का व्यापक इस्तेमाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा बदलाव ला सकता है। प्रतिदिन लगभग 100 किलोग्राम गोबर और रसोई के गीले कचरे से चलने वाला एक प्लांट हर महीने करीब 130 से 135 किलोग्राम व्यावसायिक एलपीजी की बचत कर सकता है। इसके साथ ही किसानों को प्राकृतिक खाद भी मिलती है, जिससे खेती की लागत घटाने में मदद मिलती है।

सिंटेक्स पिछले 25 वर्षों से फ्लोटिंग टाइप बायोगैस प्लांट का निर्माण कर रहा है। इस प्लांट को कम समय में लगाया जा सकता है और इसका रखरखाव भी बेहद कम है। जरूरत पड़ने पर इसे दूसरी जगह स्थानांतरित करना भी आसान है। इसका फ्लोटिंग सिस्टम लगातार समान दबाव के साथ गैस उपलब्ध कराता है। यह प्लांट केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) की बायोगैस योजना के तहत स्वीकृत है, जिससे पात्र परियोजनाओं को सरकारी वित्तीय सहायता का लाभ भी मिल सकता है।

सिंटेक्स का मानना है कि यदि गांवों और गौशालाओं में इस तरह के बायोगैस प्लांट बड़े स्तर पर लगाए जाएं तो गोबर और गीले कचरे का बेहतर उपयोग होगा, नगरों और गांवों में कचरे की समस्या कम होगी, एलपीजी पर निर्भरता घटेगी और किसानों को प्राकृतिक खाद उपलब्ध होगी। इससे ग्रामीण आय बढ़ाने और आत्मनिर्भर गांव बनाने के सरकार के लक्ष्य को भी मजबूती मिलेगी।

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